ज़ुल्म के दौर में आवश्यकता है निर्णायक फैसले देने वाली उस जननी की जिसने उस पूत या पूतनी को जन्म दिया हो जिससे की समाज और देश शर्मशार हो रहा है. बहुत पहले देखी फिल्म मदर इन्डिया
की याद आती है जिसमे नायक अपना प्रतिशोध लेने के लिए गलत ढंग से खलनायक
की बेटी के साथ जबरदस्ती करने पर अमादा हो जाता है उस समय उसकी जननी द्वारा
उसे काफी समझाने के बाद भी बात नहीं बनती तो उसे माँ के द्वारा ही सरे आम
गोली मार कर यह फैसला और सन्देश समाज और देश को देने का प्रयाश था की समय
पड़ने पर जिस माता का पूत अपने माँ की कोख और तंत्र तथा दुसरे स्त्री के कोख
और तंत्र में भेद करता हो उसे त्यागना ही नहीं अपितु जान से मरना भी पड़े
तो इसमें कोताही नहीं करना चाहिए क्योकि एक अच्छे सन्देश और मिशाल से ही स्वस्थ
समाज का निर्माण हो सकता है. गुजरे ज़माने की बात हो गई ऐसी फिल्मे और उसके
सन्देश .अब तो केवल फूहड़ प्रेम प्रसंग ,आइटम डांस और उत्तेजक दृश्य तथा
भंगिमाए जो अच्छे से अच्छे ऋषि मुनि को भी अप्सरा की भांति भरमाये और उसकी
काम शक्ति का परिक्षण करे वही फिल्मे ही बनती और चलती है जो समाज को विष परोस सके ,बबूल का वृक्ष बो सके जिससे हम आम पाने की झूठी आशा करते रहे. और कहे ही आजकल चारो तरफ दुराचार बढ़ गया है ...इत्यादि -इत्यादि .जिसके पास पैसा है सम्पन्नता है उसका दुराचार तो छिप जाता है पर इस गंदे माहौल की आंधी में
छोटे और हलके लोग चपेट में आ कर जगजाहिर हो जाते है .इनका उपचार इनकी
जननी या बहिनों द्वारा ही आरम्भ से शिक्षा दे कर किया जाना चाहिये और उसके बाद भी यदि कांटे का ही सृजन हो तो तालिबानी संस्कृति की तरह ही कंटीले झाड़ी को ही जड़ से काट देना उचित होगा जिससे की दुसरे को भी नसीहत मिल सके ... यदि इन मामलो में हमारी माँताए बहिने भी जरा सबक से रहे और मर्यादा का उल्लंघन नहीं करे तो सोने में सुगंध आ सकता है क्योकि कहा भी गया है की आग और धुंए
का आपस में सम्बन्ध होता है. विपरीत लिंग और खूबसूरती के पीछे सभी का
आकर्षण होता है कुछ फूल को देखना पसंद करते है तो कुछ मनोविकारी उसे
तोडना और मसलना पसंद करते है .आरम्भ से ही समर्थ वान को नहीं दोष दोष
गुसाई की पम्परा के अनुसार किया जाने वाला आचरण अब लोगो के लिए फास बन
सकती है .को -एजुकेशन की अवधारना से इसे काफी हद तक सुलझाया जा चूका है की
नर और नारी भगवन की बनाइ एक कृति है जो केवल मांस का एक पिण्ड का ही फेर
है शेष सभी एक सामान होता है ..किन्तु फिर भी इक्छा और आवेग को सम्हालना
अच्छे अच्छे के बस में नहीं होता और कमजोर संस्कार रूपी बांध के सामान
समय आने पर टूट जाते है .बहुत ही किस्मत वाले होते है जो इस समय परम
प्रभु की कृपा से सहारे सफलता से दुसरे किनारे बच निकलते है और दुसरो को उन राहों पर चलने से रोक पाते है .
PANKAJ YADAV
PANKAJ YADAV
No comments:
Post a Comment